दीक्षाभूमि से पीएम मोदी का बड़ा सियासी संदेश: दलित राजनीति, हिंदू एकता और 80-20 का समीकरण

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LIvekhabhar | Chhattisgarh News

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र के नागपुर में स्थित दीक्षाभूमि का दौरा कर संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने विजिटर्स बुक में लिखा कि “विकसित और समावेशी भारत का निर्माण ही डॉ. आंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।” उनके इस कदम को राजनीतिक दृष्टिकोण से अहम माना जा रहा है, जिसमें दलित राजनीति, हिंदू एकता और 80-20 के चुनावी समीकरण साधने की कोशिश दिखाई दे रही है।

बीजेपी की दलित राजनीति और सामाजिक न्याय का दांव

पीएम मोदी के इस दौरे को बीजेपी की दलित और सामाजिक न्याय की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एनडीए अपने दलित नेताओं चिराग पासवान और जीतनराम मांझी के जरिए दलित वोटबैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। इसके जवाब में कांग्रेस ने भी दलित नेता राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अपनी रणनीति बनाई है।

संविधान और विपक्षी रणनीति को काउंटर करने की कोशिश

विपक्षी दलों ने पिछले लोकसभा चुनाव में यह नैरेटिव गढ़ा था कि बीजेपी संविधान बदलना चाहती है, जिससे उसे बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने में मुश्किल हुई थी। हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह की आंबेडकर पर की गई टिप्पणी को भी विपक्ष ने मुद्दा बना लिया था। ऐसे में पीएम मोदी का दीक्षाभूमि दौरा इस नैरेटिव को कमजोर करने की एक कोशिश मानी जा रही है।

80-20 का राजनीतिक समीकरण

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले भी कह चुके हैं कि चुनाव 80-20 के समीकरण पर लड़ा जाएगा। इसमें 80% हिंदू वोटों को बीजेपी के पक्ष में लाने की रणनीति मानी जाती है। अब बीजेपी दलित समुदाय को भी अपने साथ जोड़ने के लिए सक्रिय हो गई है, ताकि विपक्ष को कोई मौका न मिले।

बौद्ध राजनीति और पूर्वोत्तर को संदेश

भारत में बौद्ध धर्म के अनुयायी कम संख्या में हैं, लेकिन पूर्वोत्तर में उनका खासा प्रभाव है। इन राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं। पीएम मोदी के दीक्षाभूमि दौरे को पूर्वोत्तर में बौद्ध समुदाय को संदेश देने और उनके समर्थन को और मजबूत करने की रणनीति से भी जोड़ा जा रहा है।

पीएम मोदी का यह दौरा केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके जरिए उन्होंने कई राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश की। दलित राजनीति, हिंदू एकता और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर विपक्षी दलों को काउंटर करने के लिए यह बीजेपी की एक रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है।


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